योगासन – शरीर का अतिक्रमण’

 योगासन –” शरीर का अतिक्रमण “ स्थिरसुखमासनम् ॥ 46 ॥स्थिर और सुखपूर्वक बैठना आसन है। पतंजलि के योग को बहुत गलत समझा गया है, उसकी बहुत गलत व्याख्या हुई है। पतंजलि कोई व्यायाम नहीं सिखा रहे हैं, लेकिन योग ऐसा मालूम पड़ता है जैसे वह शरीर का व्यायाम मात्र हो। पतंजलि शरीर के शत्रु नहीं

आयुर्वेद में कायचिकित्सा का महत्व

आयुर्वेद एक जीवन शास्त्र है। स्वस्थ्य के स्वास्थ्य की रक्षा तथा आतुर के विकार का प्रशमन, ये ही आयुर्वेद के दो मुख्य उद्देश्य हैं। कायचिकित्सा अष्टांङ्ग आयुर्वेद का मुख्य अंग है। हमेशा से ही यह आयुर्वेद का सबसे महत्वपूर्ण एवं जीवन्त अंग रहा है। ‘काय’ शब्द सर्वशरीर, अन्तराग्नि तथा सम्पूर्ण चयापचय व्यापार को परिलक्षित करता

धारा की श्रृंखला

मानवी शरीर असंख्य स्रोतसों से बना हुआ है यह एक ज्ञात बात है। यह स्रोतस् शरीर पदार्थों को एक भाग से दुसरे भाग में वहन करनेवाली मात्र नालियाँ नहीं है। यह वो मार्ग है जिनमें से गुजरते हुए शरीर घटकों में बदलाव होते जाते हैं। यह वो अयन है जो परिणाम आपद्यमान धातुओं का वहन

प्राचीन आचार्यों का विज्ञान और वर्तमान यथार्थ

हमारे आचार्यों के अद्वितीय सूत्र हमारे प्राचीन आचार्यों ने जिन विषयों पर गहन शोध और अन्वेषण करके जो सूत्र रूप में लिखा है, वह अक्षरशः सत्य माना जाता है। उनके ज्ञान को आज के यथार्थवादी वैज्ञानिक, जो निरंतर परिश्रम कर रहे हैं, अभी तक पूरी तरह से प्राप्त नहीं कर सके हैं। सत्यप्रिय वैज्ञानिकों ने

Ayurvedic Medicine for fatty liver

हरड़, बहेड़ा, ऑवला, , सोंठ, मिर्च, पीपल, चित्रक- मूल, वायविडंग २ ।।- २ ॥ तोला, नागरमोथा १ ॥ तोला, पीपलामूल, देवदारु, दारुहल्दी, दालचीनी, चव्य- प्रत्येक १-१ तोला, शुद्ध शिलाजीत, स्वर्णमाक्षिक भस्म, रौप्यभस्म, लौह भस्म- प्रत्येक १००- १० तोला, मण्डूर भस्म २० तोला, मिश्री ३२ तोला- सबको बारीक पीसकर छान लें। – आ.प्र. मात्रा और अनुपान-

पंचकर्म

वर्तमान समय एक व्यस्तथ आधुनिक मशीनी युग बन गया है। जिसके कारण लोगों की जीवनचर्या में मूलभूत परिवर्तन हुए हैं जिसमें आहार सम्बन्धी जैसे फास्ट फूड, डिब्बा बंद भोजन, उच्च कैलोरी युक्त भोजन, अतिशीत भोजन ग्रहण तथा शारीरिक श्रम एकदम अल्प हो गया है। अर्थात् वर्त्तमान युग में शारीरिक श्रम कम तथा मानसिक श्रम अधिक

Basic Ayurveda

आयुर्वेद के मूल द्रव्य (त्रिदोष )Basic Ayurveda महर्षि कपिलदेवजी ने सृष्टिनिर्माण को पुरुष और प्रकृति के संगम का परिणाम माना है। उनके मतानुसार, पुरुष निर्लेप, निर्गुण और अपरिणामी है, जबकि प्रकृति जड़ और परिणामी है, जो क्षण-क्षण में नया रूप धारण करती है। ये प्रकृति और पुरुष दोनों ही अचिन्त्य, अनादि और अनन्त हैं। प्रकृति

आयुर्वेद की परिभाषा, उत्पति और इतिहास भाग २

आयुर्वेद की परिभाषा, उत्पति और इतिहास भाग २ “यह निर्विवाद सत्य है कि सत्य को कोई छिपा नहीं सकता। अंतिम निर्णय भी वही होता है, जो सत्य पर आधारित होता है। सारांश यह है कि सत्य की सदैव विजय होती है। ‘सत्ये नास्ति भयं कचित’ इस उक्ति के अनुसार सत्य को किसी भी प्रकार का

आयुर्वेद की परिभाषा, उत्पति और इतिहास भाग १

आयुर्वेद की परिभाषा, उत्पति और इतिहास भाग १ आयुर्वेद अत्यंत प्राचीन शास्त्र है। वास्तव में, प्राचीन आचार्यों ने इसे ‘शाश्वत’ कहा है और इसके लिए तीन अकाट्य युक्तियाँ दी हैं: ‘सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते’ – आयुर्वेद शाश्वत है।‘अनादित्वात्’ – यह अनादि है।‘स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात्’ – इसके स्वभाव में जन्मजात विशेषताएँ हैं।‘भावस्वभावनित्यत्वात्’ – इसका स्वभाव निरंतर रहता है। आयुर्वेद को